बच्चों को आख़िर पाला कैसे जाए!

 परवरिश:

मैं शिक्षक हूँ, मैंने कई माँ-बाप से इस बारे में बात की है, लगभग हर माँ-बाप की समस्या रहती है कि पढ़ाई वगैरह तो ठीक है, पढ़ाई में अच्छे बुरे बच्चे होते हैं मगर बच्चे से जुड़ी हुई छोटी-छोटी बातें अक्सर परेशान करने लगती हैं।

बच्चे आपस मे मिलते हैं, उनमे हर प्रकार के बच्चे होते हैं, यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि हर माँ-बाप अपने बच्चों पर अपने मुताबिक ठीक ठाक ध्यान देते हैं उनके हिसाब से वो ठीक ही करते होंगे। किंतु,  दुनिया के लिए जो चश्मा बच्चे पहनते हैं और जो माँ-बाप का चश्मा होता है उसमे ज़मीन आसमान का फर्क होता है।

इसी अंतर को सफलतापूर्वक कम करना आवश्यक है, नहीं तो आप पाएँगे की आपने अपने बच्चों को जिस मापदंड से बड़ा किया, उनका तेवर और उनकी पसंद-नापसन्द एकदम अलग और साथ ही विकृत भी है। ऐसा भी हो सकता है कि स्वयं माँ-बाप का मापदंड और नज़रिया सही न हो। क्योंकि छोटी-छोटी बातों का आपके बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ेगा इस बात का एहसास पहले तो आपको होना चाहिए, आपको उचित तरीके से अपने बच्चे के भीतर चल रहे विचारों को संवेदनशीलता के साथ समझना होगा, अगर आप छोटी बातों को नजरअंदाज़ कर देते हैं तो मैं मानता हूं आपका स्वयं का नज़रिया सही नहीं है।

ऐसा ही एक उदाहरण मेरे सामने आया जिसमे माँ अपनी बच्ची की कक्षा ने होने वाली बातों के विषय मे चिंतित थीं, उनकी बच्ची ने बताया कि कक्षा में लड़के डबल मीनिंग में बात करते हैं, और अगर उनका सपोर्ट न किया जाए तो वो किसी न किसी तरीके से हमको परेशान करते हैं।
ऊपर जो उदाहरण मैंने बताया है वह तो एक छोटा सा उदाहरण है। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो मैं समझता हूँ हर घर मे कभी न कभी चर्चा में आती होगी।

बात ये नहीं है कि ऐसा हो रहा है हर तरह के लोग हमेशा थे आप तुरंत लोगों को नहीं बदल सकते, बदलाव समय की मांग करता है।
मगर स्वयं को बदला जा सकता है। स्वयं को जीवन के सही केंद्र में स्थापित किया जा सकता है।

जो भी संभव स्थितियां कक्षा के अंदर बन सकती हैं उनके विषय ने बच्चों से बात कीजिए, उनको समझाइए कि, बेटा क्लास में ऐसा, ऐसा, ऐसा होगा तो आपको किस तरह अपने के सम्हालना है।
हर संभव बात उनको समझाइए, चाहे वो बात कोई भी हो, अगर ऐसा नहीं करेंगे आप तो आपका बच्चा बाहर जाकर वही चीज़ दूसरे से सीख लेगा और वो दूसरा कोई भी हो सकता है उसके कक्षा की कोई लड़की या लड़का, जो स्वयं अभी अपरिपक्व है, उसकी जो समझ होगी उसके हिसाब से वो समझा देगा और आप देखते रह जाएंगे।

एक और बात है कि कोई अप्रिय घटना घटे, कोई ऐसी बात हो जाये जो आपको हतप्रभ कर जाए उससे अच्छा है आप हर विषय पर अपने बच्चों से बात करें। अक्सर देखा गया है कि बच्चों से बात करने पर वो बातों को समझते हैं और फिर सही दिशा में बढ़ते भी हैं।

जो लोग अपने बच्चों से बात नहीं करते, उनको समझते नहीं है, समझाते नहीं है। वो किसी भी तरह की घटना या अप्रियता को बरदाश्त करने के लिए तैयार रहें, क्योंकि आप जीवन की जिन बातों को लेकर असहज हैं वो कक्षा के अंदर सामान्य रूप से चर्चा में रहती हैं।

दूसरी बात है आपका कोई अपना बच्चा है उसकी कमी को नजरअंदाज आप कतई न करें, ऐसा न मानकर चलें कि मेरा बच्चा तो ऐसा कर ही नहीं सकता। किसी का भी बच्चा कुछ भी कर सकता है। अगर बच्चे के अंदर उचित बातों को प्रवेश नहीं दिलाया गया है, तो वो ग़लत समय पर शरीर की प्रकृतिक मांगों की ओर मुड़ जाएगा, प्रकृति 13-14 वर्ष की आयु में संतानुत्पत्ति के लायक बच्चों को बना देती हैं। तो प्रकृति का इरादा अलग है, और आपके इरादे अलग हैं। और अगर बच्चों को नहीं सिखाया गया, नहीं बताया गया कि उचित अनुचित क्या है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि बच्चा ग़लत दिशा की ओर ही जायेगा। क्योंकि सामान्य नैतिकता से प्राकृतिक मांगों को आप रोक भी नहीं पाएंगे प्राकृतिक मांगे जीत जाएंगी आप कुछ नहीं कर पाएंगे।

यह बात याद रखने लायक है कि कोई भी दिशा ग़लत या सही दिशा नहीं होती, किसी बात पर भी ग़लत-सही का ठप्पा सामाजिक मान्यताओं के आधार पर लगाना मैं उचित नहीं समझता। किंतु आवश्यक है कि जो भी किया जाए होश में किया जाए, हर काम का एक समय होता है उस समय का आभास बच्चों को करना आवश्यक है, बहुत रूढ़िवादी बनकर बच्चों से बात करने से बात नहीं बनेगी उनको खुलकर सब समझाना होगा। 
जो भी किया जाए होश में किया जाए का मतलब है आप अपनें बच्चों को बिल्कुल यह बात बतला सकते हैं कि सही कौन है और ग़लत कौन है, जो सही है उसका चुनाव करने से क्या होता है और ग़लत का चुनाव करने से क्या होता है। बच्चों को कोरी नैतिकता मत सिखाइये कि बेटा ऐसा नहीं करना चाहिए वैसा नहीं करना चाहिए, बच्चे को कुछ ऐसा देना होगा जो उसको जीवन की ऊंचाइयों का कम से कम स्वाद चखाये। और आवश्यक नहीं है कि जीवन की ऊंचाई आप जिसको मानते हैं वही है, जीवन की ऊंचाई आती है बोध से वह बोध वह समझ पहले आप के अंदर होना चाहिए तभी आप उसको उसमे डाल पाएंगे।

बोध मतलब क्या? बोध मतलब आपको अपने बच्चे को बताना होगा कि बेटा जो ज्ञान होता है, जो समझ होती है, उसकी पूजा होती है। थोड़ा अध्यात्म की समझ आपको भी होना चाहिए। अध्यात्म में कोरी नैतिकता की जगह सत्य का और पूर्णता का ज्ञान निहित होता है। उसको देने से परहेज न करें (यह अपने आप मे एक विशद विषय है जिसके बारे में फिर कभी चर्चा करने का प्रयास करूंगा)।
लड़की है तो उनके जीवन में उसके लिए ये बात ज्यादा आवश्यक हो जाती है, क्योंकि निश्चित ही जो लड़की अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाती उसको आगे समस्याओं का, और मैं तो कहूँगा अपमान का सामना करना पड़ता है। स्पष्ट कहना होगा कि बेटा विवाह के बाद जो अपने पैरो पर खड़ा नहीं हो पाता उसका जीवन बड़ा दुष्कर होता है, और आप जानते हैं इसमें कोई संदेह नहीं है।कुछ इस प्रकार की गहरी बातें बतानी होंगी,आप बताएंगे तो असर तुरंत शायद न हो किंतु अच्छाई में ताकत होती है इस विश्वास के साथ आप बताएं सकारात्मक परिणाम आएंगे।

मैं समझता हूँ जिन बातों को मैं कह नहीं पाया उनको आप स्वयं समझेंगे और ये ब्लॉग आपको कुछ स्पष्टता प्रदान करेगा।

धन्यवाद!

Comments

  1. सच्चे अर्थों में मां-बाप का यही कर्तव्य है की बच्चों को एक अच्छा माहौल उपलब्ध करवाएं बच्चों के मन में जो भी खोट या दुर्गुण दिखता है उसका कारण एक ही होता है संगति या माहौल बच्चों को सही माहौल दे दो, सब सही हो जाएगा।

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